आदत अतीत से जुड़कर अतीत को ही भविष्य में पटकने पर उतारू होती है। आदत से बचने के लिए अपने भीतर के स्वभाव को समझना होगा। अभी तो हमने भक्ति को भी आदत बना लिया है, जबकि भक्ति स्वभाव का विषय है।
सामान्य रूप से ऐसा समझा जाता है कि जो लोग भक्ति कर रहे हैं, वे या तो कमजोर लोग हैं या छोटे ओहदे के व्यक्ति हैं। यह एक भ्रम है। जिनके पास मिटने की क्षमता है, वे ही भक्ति कर सकेंगे, क्योंकि जितना हम मिटेंगे, उतने ही हमारे भीतर के परमात्मा को रूप लेने का अवसर मिलेगा।
भक्ति एक आत्मघाती कला है। इसलिए जैसे-जैसे भक्ति जीवन में उतरेगी, हमें भीतर उतरने में सुविधा होगी। मन को निष्क्रिय करने में सहारा मिलेगा। अभी मन मालिक है और शरीर गुलाम। लेकिन भक्ति के उतरते ही परमात्मा प्रकट होने लगता है और ईश्वर की अनुभूति के सामने मन गौण हो जाता है।
मन मौन हुआ और हमारी सारी मस्ती, धूमधाम भौतिक सफलताओं के बाद भी हमें शांत रखेगी, प्रकाश ही प्रकाश होगा और इसी प्रकाश को आंतरिक उत्सव कहा गया है। जब हर काम में आनंद आने लगे तो फिर जिंदगी के अर्थ ही बदल जाते हैं।
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