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भगवान के हर एक रानी से दस पुत्र थे। भगवान के परम्पराक्रमी पुत्रों में अठारह तो महारथी थे, जिनका यश सारे जगत् में फैला हुआ था। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, दीप्तिमान, भानु, साम्ब, मधु, बृहद्भानु, चित्रभानु, वृक, अरुण, पुष्कर, वेदबाहु, श्रुतदेव, सुनन्दन, चित्रबाहु, विरूप, कवि और न्यग्रोध। इन पुत्रों में भी सबसे श्रेष्ठ रुक्मिणी नन्दन प्रद्युम्नजी थे। यदुवंश के बालकों को शिक्षा देने के लिए तीन करोड़ अठ्ठासी लाख आचार्य थे।
जो लोग भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा का अधिकार प्राप्त करना चाहे, उन्हें उनकी लीलाओं का ही श्रवण करना चाहिए। जब मनुष्य निरंतर श्रीकृष्ण की लीला-कथाओं का अधिकाधिक श्रवण, कीर्तन और चिन्तन करने लगता है, तब उसकी यही भक्ति उसे भगवान के परमधाम में पहुंचा देती है। यद्यपि काल की गति के परे पहुंच जाना बहुत ही कठिन है, परन्तु भगवान के धाम में काल की दाल नहीं गलती। वह वहां तक पहुंच ही नहीं पाता।
यहां दसवें स्कंध के समापन पर शुकदेवजी ने भक्ति के सामने काल को भी छोटा बताया। यही भागवत का प्रमुख संदेश है। भागवत मरने की कला सिखाती है। मृत्यु तो सबकी निश्चित है, परन्तु काल को किस कला से स्वीकार करें यही भागवत का संदेश है।जिसने भी देह धारण की है उसे जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त यात्रा करनी ही है। उसमें कई पड़ाव आते हैं, उनमें वह रुकता नहीं, बढ़ता जाता है। दैहिक पड़ाव है-गर्भ अवस्था, शिशु अवस्था, किशोर
अवस्था, युवा अवस्था, वृद्धावस्था और जरा-अवस्था। इन अवस्थाओं में सुख का भी अनुभव होता है और दु:ख का भी। सुख-दु:ख कर्मों के फल कहे जाते हैं।इस तथ्य को पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए उजागर किया-मनुष्य जो शुभ कर्म करता तथा दूसरों से कराता है-इन दोनों प्रकार के कर्म का अनुष्ठान करके प्रसन्न होना चाहिए, क्योंकि इनका फल सुख है और अशुभ कर्म हो जाने पर उससे अच्छे फल की आशा नहीं करनी चाहिए।
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