Thursday, 18 August 2011

सिर्फ आंखें बंद कर लेने से अंधेरा नहीं हो जाता!

योग में रुचि रखने वालों को यह बात अच्छी तरह से ज्ञात होगी कि योग की दुनिया को सम्पन्न बनाने में जितना योगदान महर्षि पतंजलि का है उतनी ही भूमिका नाथ संप्रदाय के अग्रणी गोरखनाथ जी की भी है। योग और साधना के विभिन्न आयामों के क्षेत्र में गोरखनाथ ने जितना योगदान दिया है उतना सायद ही किसी दूसरे परवर्ती योगी या साधक ने दिया हो। अष्टांग योग से लेकर हठयोग तक योग के हर छोटे बड़े पहलुओं पर गोरखनाथ जी ने भरपूर प्रकाश डाला है। उनकी गोरखवाणी में योग के ऐसे-ऐसे कीमती सूत्र भरे पड़े हैं जिनपर चलकर कोई भी सच्चा साधक नर से नारायण बन सकता है। एक बार की घटना है कि गोरखनाथ जी के पास एक व्यक्ति आया और आकर अपने जीवन की कठिनाइयों और दुखों का वर्णन करने लगा। उसने कहा कि वह अपने जीवन से इतना दुखी और त्रस्त हो चुका है कि सिवाय आत्महत्या करने के अलावा उसके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं बचा है।

गोरखनाथ जी पहले तो थोड़ा मुस्कुराए और फिर गंभीर होकर बोले जिस काम को करने का तुम कह रहे हो वह किसी के भी द्वारा संभव नहीं है। जिन परेशानियों से भागकर तुम मृत्यु को गले लगाने की सोच रहे हो वे तो मौत के बाद भी तुम्हारे साथ ही बनी रहेंगी। तुम आत्महत्या कर ही कैसे सकते हो? तुम तो सिर्फ अपने कीमती और बेकसूर शरीर को खत्म कर सकते हो जिससे कि कुछ होने वाला नहीं है। तुम अपनी जिंदगी  का सफर जंहा से अधूरा छोड़ोगे तुम्हारी आत्मा को फिर से नया शरीर धारण करके फिर वहीं से सफर का प्रारंभ करना पड़ेगा। इसलिये आत्महत्या करने की इस मूर्खतापूर्ण इच्छा को तत्काल त्याग दो, क्योंकि यहां इस संसार में कोई भी आत्महत्या कर ही नहीं सकता। हां अपने कीमती शरीर को नष्ट करने की मूर्खता अवश्य कर सकता है।

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